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धनतेरस

Dhanteras
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📅 आगामी तिथियाँ (Upcoming dates)

6 नवंबर 2026, शुक्रवार · धनतेरस 14 दिन बाद
27 अक्टूबर 2027, बुधवार · धनतेरस 369 दिन बाद

सटीक मुहूर्त आपके शहर के अनुसार बदलता है, आज का पंचांग देखें।

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धनतेरस का महत्व (Why Dhanteras is celebrated)

धनतेरस कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी को मनाया जाता है और यह पाँच दिवसीय दीपावली उत्सव का पहला दिन है। इसे धनत्रयोदशी भी कहा जाता है। पौराणिक कथा के अनुसार समुद्र मंथन के समय भगवान धन्वंतरि अमृत से भरा कलश लेकर प्रकट हुए थे। उन्हें आयुर्वेद का देवता माना जाता है, इसलिए इस दिन उत्तम स्वास्थ्य की कामना भी की जाती है। भारत में इसी दिन आयुर्वेद दिवस भी मनाया जाता है। इस दिन माता लक्ष्मी और धन के देवता कुबेर की पूजा का भी विधान है। मान्यता है कि सच्चा धन केवल सोना-चाँदी नहीं, बल्कि स्वास्थ्य, सुख और संतोष है।

कब मनाया जाता है (When it falls)

धनतेरस कार्तिक कृष्ण त्रयोदशी को पड़ता है, जो दीपावली से लगभग दो दिन पहले आता है। पूजा के लिए प्रदोष काल यानी सूर्यास्त के बाद का समय शुभ माना जाता है, इसलिए त्रयोदशी तिथि जिस दिन प्रदोष काल में व्याप्त हो उसी दिन पूजन किया जाता है। ऊपर दी गई कैलेंडर तारीख देखें और अपने शहर के पूजा मुहूर्त के लिए पंचांग देखें।

पूजा सामग्री सूची (Samagri checklist)

• भगवान धन्वंतरि, माता लक्ष्मी और कुबेर देव की मूर्ति या चित्र, चौकी, लाल या पीला वस्त्र • कलश, गंगाजल, नारियल, आम के पत्ते • रोली, चंदन, अक्षत, हल्दी, कमल या गेंदे के फूल • धूप, घी के दीपक, कपूर • मिठाई, खील-बताशे, फल, मेवे • नए बर्तन, सिक्के या आभूषण (पूजन के लिए), आटे का चौमुखा दीपक यम दीपदान के लिए

पूजन विधि (Puja vidhi)

१. प्रातः स्नान करके घर और पूजा स्थल की सफ़ाई करें। मुख्य द्वार पर रंगोली और तोरण सजाएँ। २. संध्या के प्रदोष काल में चौकी पर धन्वंतरि, लक्ष्मी और कुबेर की प्रतिमा स्थापित करें। ३. कलश स्थापित कर दीप जलाएँ और रोली, अक्षत, फूल, मिठाई अर्पित करें। ४. धन्वंतरि मंत्र, कुबेर मंत्र और लक्ष्मी मंत्र का जप करें। ५. माता लक्ष्मी की आरती करें और प्रसाद बाँटें। ६. पूजन के बाद नए बर्तन, सिक्के या आभूषण की भी पूजा करें।

यम दीपदान (Yam Deepam)

संध्या के समय घर के मुख्य द्वार के बाहर दक्षिण दिशा की ओर मुख करके आटे का चौमुखा दीपक जलाया जाता है, जिसे यम दीपदान कहते हैं। मान्यता है कि इससे अकाल मृत्यु के भय का निवारण होता है। कथा के अनुसार राजा हिम के पुत्र की कुंडली में विवाह के चौथे दिन सर्प के डसने से मृत्यु का योग था। उसकी पत्नी ने उस रात द्वार पर आभूषणों और सिक्कों का ढेर लगाकर चारों ओर दीप जलाए और जागकर कथा-गीत सुनाए। यमराज सर्प के रूप में आए, पर दीपों और आभूषणों की चमक से भीतर नहीं जा सके और लौट गए। तभी से यम दीपदान की परंपरा चली।

खरीदारी की परंपरा (What people buy)

इस दिन सोना, चाँदी, बर्तन, नया सामान या कोई भी शुभ वस्तु खरीदना शुभ माना जाता है। मान्यता है कि इससे वर्ष भर घर में समृद्धि बनी रहती है। खरीदारी अपनी सामर्थ्य के अनुसार करें, क्योंकि पूजा की भावना ही सबसे महत्वपूर्ण है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

1धनतेरस 2026 में कब है?
धनतेरस 6 नवंबर 2026, शुक्रवार को मनाया जाएगा। सटीक पूजा मुहूर्त आपके शहर के अनुसार बदलता है, इसलिए अपने शहर का पंचांग देखें।
2धनतेरस पर क्या खरीदना शुभ माना जाता है?
सोना, चाँदी, पीतल या ताँबे के बर्तन, सिक्के और नया सामान शुभ माने जाते हैं। इसे अपनी सामर्थ्य के अनुसार खरीदें।
3धनतेरस की पूजा किस समय करनी चाहिए?
पूजा प्रदोष काल यानी सूर्यास्त के बाद के समय में करना शुभ माना जाता है। सटीक मुहूर्त शहर के अनुसार बदलता है, इसलिए अपने शहर का पंचांग देखें।
4यम दीपदान कब और कैसे करें?
संध्या के बाद घर के बाहर दक्षिण दिशा की ओर मुख करके आटे का चौमुखा दीपक जलाया जाता है। यह दीप घर के मुख्य द्वार या आँगन में रखा जाता है।
5धनतेरस को धन्वंतरि जयंती क्यों कहते हैं?
मान्यता है कि इसी दिन समुद्र मंथन से भगवान धन्वंतरि अमृत कलश के साथ प्रकट हुए थे, इसलिए इसे धन्वंतरि जयंती भी कहा जाता है।
6धनतेरस पर किसकी पूजा होती है?
इस दिन भगवान धन्वंतरि, माता लक्ष्मी और कुबेर देव की पूजा की जाती है। संध्या को यमराज के निमित्त दीपदान भी किया जाता है।
7धनतेरस के दिन क्या करें और क्या न करें?
करें: घर की सफ़ाई, मुख्य द्वार पर रंगोली और दीप, प्रदोष काल में पूजन, यम दीपदान, और सामर्थ्य अनुसार खरीदारी तथा दान। न करें: अपनी सामर्थ्य से अधिक खर्च न करें और घर में अंधेरा या गंदगी न रहने दें।
8धनतेरस पर झाड़ू खरीदना क्यों शुभ माना जाता है?
कई परिवारों में मान्यता है कि नई झाड़ू लक्ष्मी का प्रतीक है और घर से दरिद्रता दूर करती है। यह एक लोक-परंपरा है, जो क्षेत्र के अनुसार भिन्न हो सकती है।

परंपराएँ क्षेत्र और परिवार के अनुसार भिन्न हो सकती हैं। पूजा-विधि के लिए अपने पंडित या कुल-परंपरा की सलाह लें।