📖 व्रत कथा
एकादशी व्रत कथा (उत्पन्ना एकादशी)

एकादशी व्रत कथा (उत्पन्ना एकादशी)

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पारंपरिक कथा (पुनर्कथन)

भाग १: युधिष्ठिर का प्रश्न

एक बार धर्मराज युधिष्ठिर ने भगवान श्रीकृष्ण से पूछा, "हे जनार्दन, एकादशी का व्रत सब व्रतों में श्रेष्ठ क्यों माना गया है? इसकी उत्पत्ति कैसे हुई? कृपा करके मुझे इसका पूरा वृत्तांत सुनाइए।"

भाग २: दैत्य मुर और देवताओं का संकट

श्रीकृष्ण बोले, "हे राजन्, यह सतयुग की बात है। चंद्रावती नगरी में मुर नाम का एक महाबली दैत्य रहता था। वह नाड़ीजंघ का पुत्र था। अपने पराक्रम के मद में उसने इंद्र, वरुण, यम, अग्नि और सब देवताओं को हरा दिया और स्वर्ग पर अपना अधिकार जमा लिया। देवता भयभीत होकर पर्वतों और गुफाओं में छिपकर जीवन बिताने लगे।

जब कोई उपाय नहीं सूझा तो सब देवता इंद्र के साथ कैलाश पर्वत पर भगवान शिव के पास पहुँचे और अपनी व्यथा सुनाई। शिवजी ने कहा, 'देवताओं, इस संकट में तुम सब भगवान विष्णु की शरण में जाओ। वही तुम्हारी रक्षा करेंगे।' तब देवता क्षीरसागर पहुँचे, जहाँ भगवान विष्णु शेषशय्या पर विराजमान थे। देवताओं ने हाथ जोड़कर उनकी स्तुति की और कहा, 'प्रभु, मुर दैत्य ने हमारा स्वर्ग छीन लिया है। हम आपकी शरण में हैं, हमारी रक्षा कीजिए।'

भगवान विष्णु ने कहा, 'चिंता मत करो। मैं उस दैत्य का अवश्य संहार करूँगा।' वे सब देवताओं के साथ चंद्रावती नगरी पहुँचे। वहाँ मुर अपनी असंख्य सेना के साथ गर्जना कर रहा था। भगवान ने अपने बाणों की वर्षा से क्षण भर में उसकी सारी सेना को समाप्त कर दिया। पर मुर का बल ऐसा था कि भगवान और उसके बीच हज़ारों वर्ष तक भयंकर युद्ध चलता रहा।

भाग ३: गुफा में एकादशी देवी का प्राकट्य

अंत में भगवान युद्ध से थक गए और विश्राम के लिए बद्रिकाश्रम चले गए। वहाँ सिंहावती (हेमवती) नाम की बारह योजन लंबी एक गुफा थी। भगवान उसमें जाकर शयन करने लगे। मुर भी उनका पीछा करता हुआ उस गुफा में पहुँच गया। उसने भगवान को निद्रा में लीन देखा तो मन में सोचा, 'आज मैं इस विष्णु का अंत कर दूँगा।' जैसे ही वह शस्त्र उठाकर आगे बढ़ा, उसी क्षण भगवान के शरीर से एक अत्यंत तेजस्वी और रूपवती कन्या प्रकट हुई। वह दिव्य अस्त्र-शस्त्रों से सुसज्जित थी और उसके तेज से गुफा जगमगा उठी।

उस कन्या ने मुर को ललकारा और उससे भयंकर युद्ध किया। कुछ ही समय में उसने उस महाबली दैत्य का मस्तक काट दिया और वह भूमि पर गिरकर शांत हो गया। उसके शेष साथी डरकर पाताल लोक भाग गए।

जब भगवान की निद्रा खुली तो उन्होंने मुर को मरा हुआ देखा और सामने हाथ जोड़े खड़ी कन्या को। वे आश्चर्य से बोले, 'यह शत्रु किसने मारा?' कन्या ने कहा, 'प्रभु, आप निद्रा में थे और यह दैत्य आपके वध की इच्छा से आया था। तब मैं आपके शरीर से प्रकट हुई और मैंने इसका संहार किया।'

भाग ४: वरदान और एकादशी की महिमा

भगवान बहुत प्रसन्न हुए और बोले, 'तुम मेरी ही शक्ति हो। तुम एकादशी तिथि को प्रकट हुई हो, इसलिए आज से तुम्हारा नाम एकादशी होगा। वर माँगो।' कन्या ने कहा, 'प्रभु, यदि आप प्रसन्न हैं तो मुझे वरदान दीजिए कि जो मनुष्य मेरे नाम से उपवास करे, उसके पाप नष्ट हो जाएँ और उसे आपका धाम प्राप्त हो। सब तिथियों में मैं श्रेष्ठ मानी जाऊँ।'

भगवान ने कहा, 'तथास्तु। जो भक्त तुम्हारे दिन व्रत करेगा, उसके पाप नष्ट होंगे और उसे मोक्ष मिलेगा। तुम सब तीर्थों और यज्ञों से अधिक फल देने वाली होगी।' इतना कहकर भगवान अंतर्धान हो गए। तभी से संसार में एकादशी का व्रत प्रचलित हुआ।

हे युधिष्ठिर, इसी कारण यह उत्पन्ना एकादशी कहलाई, क्योंकि इसी दिन एकादशी देवी की उत्पत्ति हुई थी। जो मनुष्य एकादशी के दिन अन्न का त्याग करके श्रद्धा से भगवान विष्णु का पूजन करता है और यह कथा सुनता है, वह सब पापों से मुक्त होकर विष्णुलोक को प्राप्त होता है।"

इति उत्पन्ना एकादशी व्रत कथा संपूर्ण