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पारंपरिक कथा (पुनर्कथन)
भाग १: दानी राजा और रानी
प्राचीन काल में एक राजा था। वह बहुत दानी और धर्मात्मा था। वह प्रतिदिन ब्राह्मणों और गरीबों को दान देता और बृहस्पतिवार को व्रत रखकर देवगुरु की पूजा करता था। राजा की रानी को यह सब पसंद नहीं था। वह न तो व्रत रखती थी, न किसी को दान देती थी। वह राजा से कहती, "तुम अपना धन यों ही क्यों लुटाते हो?"
भाग २: साधु का वेश और रानी की भूल
एक बृहस्पतिवार को जब राजा शिकार पर वन गया हुआ था, तब देवगुरु बृहस्पति एक साधु का रूप धरकर महल के द्वार पर आए और भिक्षा माँगी। रानी ने कहा, "महात्मा, मैं इस दान-पुण्य के काम से तंग आ चुकी हूँ। मेरे पति पूरा धन बाँट देते हैं। कृपा करके ऐसा उपाय बताइए कि यह सारा धन नष्ट हो जाए, ताकि मैं चैन से रह सकूँ।"
साधु ने कहा, "तुम्हारी इच्छा अजीब है। फिर भी जैसा तुम चाहती हो वैसा करो। बृहस्पतिवार को घर को गोबर से मत लीपना, कपड़े मत धोना, और बाल मत धोना। राजा को हजामत करने को कहना। भोजन में मांस-मदिरा बनाओ। ऐसा करने से तुम्हारा धन नष्ट हो जाएगा।" यह कहकर साधु अंतर्धान हो गए।
भाग ३: धन का नाश और राजा का परदेस जाना
रानी ने वैसा ही किया। कुछ ही समय में राजा का धन कम होने लगा। भोजन के भी लाले पड़ गए। राजा दुखी होकर बोला, "रानी, यहाँ रहने से अब कुछ नहीं होगा। मैं परदेस जाकर लकड़ी काटकर गुज़ारा करूँगा। तुम अपनी दासी के साथ यहीं रहो।" राजा परदेस चला गया। वह जंगल से लकड़ी काटकर बेचता और जो मिलता उसी से जीवन चलाता।
भाग ४: बहन की सीख
उधर रानी और दासी भूखी रहने लगीं। सात दिन में केवल एक बार भोजन मिलता। एक दिन रानी ने दासी से कहा, "तू मेरी बहन के घर जा और उनसे कुछ अनाज माँग ला।" दासी रानी की बहन के घर गई। उस दिन बृहस्पतिवार था और बहन कथा सुन रही थी। उसने दासी की बात का उत्तर नहीं दिया। दासी निराश होकर लौट आई और रानी से सब कहा।
रानी ने क्रोध में कहा, "देखो, बहन ने भी मदद नहीं की।" पर शाम को कथा पूरी होने के बाद बहन स्वयं आई और बोली, "बहन, जब तुम्हारी दासी आई थी उस समय मैं कथा सुन रही थी, इसलिए बोल न सकी। अब बताओ, क्या कहना चाहती थीं?" रानी ने सारा हाल कहा। बहन ने समझाया, "यह सब बृहस्पतिवार के नियमों की अवहेलना का फल है। तुम बृहस्पतिवार का व्रत करो, इस दिन घर का काम सही ढंग से करो और केले के वृक्ष की पूजा करो। देवगुरु तुम्हारे कष्ट दूर करेंगे।"
भाग ५: व्रत से सुख की वापसी
रानी ने बहन की सलाह मानी। उसने अगले बृहस्पतिवार से पूरे नियम से व्रत किया और केले के वृक्ष की पूजा की, चने की दाल और गुड़ चढ़ाया, और दासी को भी भोजन कराया। कुछ ही दिनों में राजा के जीवन में भी बदलाव आया। उसे जंगल में एक संत मिले जिन्होंने उसे बृहस्पतिवार व्रत की महिमा सुनाई। राजा ने भी परदेस में उस दिन से व्रत शुरू किया।
कुछ समय बाद राजा को लकड़ी बेचते हुए बहुत धन मिला। उसने अपने नगर का रास्ता पकड़ा। उधर रानी ने भी व्रत जारी रखा। देवगुरु बृहस्पति प्रसन्न हुए और राजा का वैभव लौट आया। जब राजा लौटकर महल पहुँचा तो रानी ने उसके चरण पकड़ लिए और अपनी भूलों के लिए क्षमा माँगी। राजा ने उसे क्षमा कर दिया, और दोनों पुनः सुख से रहने लगे।
तभी से बृहस्पतिवार का व्रत प्रचलित हुआ। जो भी श्रद्धा से यह व्रत करता है और कथा सुनता है, उसकी निर्धनता दूर होती है, विवाह की बाधाएँ मिटती हैं, और घर में सुख-समृद्धि आती है।
इति बृहस्पतिवार व्रत कथा संपूर्ण