📖 व्रत कथा
संतोषी माता व्रत कथा

संतोषी माता व्रत कथा

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पारंपरिक कथा (पुनर्कथन)

भाग १: सात बेटों की माँ और छोटा बेटा

बहुत पुरानी बात है। एक गाँव में एक बूढ़ी माँ रहती थी। उसके सात बेटे थे। छह बेटे कमाते थे और सबसे छोटा बेटा निकम्मा समझा जाता था। माँ घर में जो कुछ बनता, पहले छह बेटों को खिलाती और जो बचता वह सबसे छोटे को परोस देती। छोटा बेटा सीधा-सादा था और माँ की हर बात को चुपचाप सहता था।

एक दिन छोटा बेटा अपनी पत्नी से बोला, "देखो, माँ मुझसे कितना कम प्रेम करती है।" पत्नी ने कहा, "सब ठीक हो जाएगा, आप चिंता मत कीजिए।" पर बेटे के मन में चोट लगी। उसने कहा, "मैं परदेस जाकर कुछ कमाना चाहता हूँ।" पत्नी ने उसे जाने की अनुमति दी और कहा, "जाओ, पर अपनी निशानी मुझे दे जाओ।" उसने अपनी अंगूठी पत्नी को दे दी और परदेस चला गया।

भाग २: बहू के कष्ट

पति के जाने के बाद सास और जेठानियाँ बहू से बहुत कठोर व्यवहार करने लगीं। उसे दिन भर घर का सारा काम करना पड़ता, जंगल से लकड़ी लानी पड़ती और खाने को केवल सूखी रोटी मिलती, पानी भी नारियल के खोल में। बहू दुखी हो गई, पर उसने कभी किसी को बुरा नहीं कहा।

भाग ३: संतोषी माता के व्रत का परिचय

एक दिन जंगल से लकड़ी लाते समय उसने कुछ स्त्रियों को पूजा करते देखा। वे किसी देवी की आराधना कर रही थीं। बहू ने पास जाकर पूछा, "बहनो, आप किसका व्रत कर रही हैं? इससे क्या फल मिलता है?" स्त्रियों ने बताया, "बहन, यह संतोषी माता का व्रत है। इसमें सोलह शुक्रवार माता की पूजा की जाती है, गुड़ और चने का भोग लगाया जाता है और खट्टा नहीं खाया जाता। इससे दुख दूर होते हैं और मन की इच्छा पूरी होती है।"

बहू ने उसी दिन से श्रद्धापूर्वक संतोषी माता का व्रत करने का निश्चय किया। उसने लकड़ी बेचने से मिले पैसों से गुड़ और चने खरीदे, रास्ते में माता का स्मरण किया और प्रसाद चढ़ाया। उसने माता से प्रार्थना की, "माँ, मेरे पति परदेस गए हैं और मुझे कोई समाचार नहीं है। कृपा करके उन्हें वापस बुला दीजिए।"

भाग ४: पति की वापसी

माता ने उसकी सच्ची प्रार्थना सुन ली। कुछ ही शुक्रवारों में पति का पत्र आया, फिर धन भेजा गया, और अंत में पति स्वयं घर लौट आया। बहू की खुशी का ठिकाना न रहा। उसने माता से कहा, "माँ, अब मेरा उद्यापन करवाइए।"

भाग ५: उद्यापन में भूल और क्षमा

सोलहवें शुक्रवार को उसने उद्यापन की तैयारी की। उसने पड़ोस के आठ बच्चों को भोजन के लिए बुलाया। जेठानियों ने जलन से अपने बच्चों को सिखाया, "तुम वहाँ जाकर खाने के बाद खट्टा माँगना।" बच्चों ने खाने के बाद खट्टा माँगा। बहू ने कहा, "बच्चो, आज संतोषी माता का दिन है, इस दिन खट्टा नहीं खाते, मैं तुम्हें पैसे दे देती हूँ।" बच्चों ने उन पैसों से इमली खरीदकर खा ली। इससे माता रुष्ट हो गईं और अचानक राजा के सिपाही बहू के पति को पकड़कर ले गए।

बहू घबरा गई और रोती हुई माता के सामने गई। उसने क्षमा माँगी और फिर से उद्यापन करने का संकल्प लिया। इस बार उसने ध्यान रखा कि कोई भी खट्टी चीज़ न आए, और उसने एक बार फिर सही विधि से उद्यापन किया। माता प्रसन्न हुईं और उसका पति सकुशल लौट आया। कुछ समय बाद बहू को सुंदर संतान प्राप्त हुई।

भाग ६: सुख की प्राप्ति

एक दिन माता ने बहू को कहा, "बेटी, तेरी सास और जेठानियों ने तुझे बहुत कष्ट दिया, पर तूने किसी का बुरा नहीं चाहा। तेरी सच्ची भक्ति से मैं प्रसन्न हूँ।" इसके बाद सास का मन भी बदल गया। उसने बहू से क्षमा माँगी और पूरा परिवार सुख से रहने लगा।

इस प्रकार संतोषी माता के व्रत के प्रभाव से बहू के सब दुख दूर हो गए, पति लौट आया, संतान का सुख मिला और घर में शांति हुई। जो भी स्त्री या पुरुष श्रद्धा से यह व्रत करता है और नियमों का पालन करता है, उसकी कामना पूर्ण होती है। बोलो संतोषी माता की जय!

इति संतोषी माता व्रत कथा संपूर्ण