📖 व्रत कथा
सोमवार व्रत कथा

सोमवार व्रत कथा

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पारंपरिक कथा (पुनर्कथन)

भाग १: निःसंतान साहूकार

बहुत समय पहले एक नगर में एक धनी साहूकार रहता था। उसके पास धन की कोई कमी नहीं थी, पर उसकी कोई संतान नहीं थी। इस कारण वह और उसकी पत्नी बहुत दुखी रहते थे। साहूकार प्रत्येक सोमवार को भगवान शिव का व्रत रखता और सायंकाल शिव मंदिर में दीपक जलाकर पूजा करता था। उसकी पत्नी भी उसके साथ श्रद्धा से यह व्रत करती थी।

भाग २: शिवजी का वरदान

एक दिन माता पार्वती ने शिवजी से कहा, "प्रभु, यह साहूकार प्रतिदिन आपका व्रत करता है, फिर भी इसे संतान क्यों नहीं मिली? कृपा करके इसकी इच्छा पूरी कीजिए।" शिवजी ने कहा, "पार्वती, संसार में सभी को अपने कर्मों का फल मिलता है। इसके भाग्य में संतान का सुख नहीं है।" पर पार्वती जी के आग्रह करने पर शिवजी ने कहा, "ठीक है, मैं इसे पुत्र प्राप्ति का वरदान देता हूँ। पर वह पुत्र केवल बारह वर्ष तक जीवित रहेगा।"

उस रात साहूकार ने स्वप्न में यह सब सुना। उसे न दुख हुआ न बहुत हर्ष, क्योंकि उसका मन भक्ति में स्थिर था। कुछ समय बाद उसके घर एक सुंदर पुत्र का जन्म हुआ। घर में उत्सव मना, पर साहूकार चुप रहा और पुत्र की आयु के बारे में किसी को नहीं बताया।

भाग ३: काशी की यात्रा

जब पुत्र ग्यारह वर्ष का हुआ तो साहूकार की पत्नी ने कहा, "अब इसका विवाह कर देना चाहिए।" साहूकार ने कहा, "मैं इसे पढ़ने के लिए काशी भेजूँगा।" उसने बालक के मामा को बुलाया और उन्हें बहुत सा धन देकर कहा, "तुम इसे काशी पढ़ने ले जाओ। रास्ते में जहाँ ठहरो, वहाँ यज्ञ करना और ब्राह्मणों को भोजन कराकर दान देना।"

मामा-भांजे चल पड़े। रास्ते में वे जहाँ ठहरते, यज्ञ करते और ब्राह्मणों को भोजन और दान देते। चलते-चलते वे एक नगर में पहुँचे जहाँ उस दिन राजा की कन्या का विवाह हो रहा था। पर दूल्हा एक आँख से काना था। उसके पिता को डर था कि राजकुमारी यह देखकर विवाह से मना कर देगी। जब उन्होंने साहूकार के सुंदर पुत्र को देखा तो सोचा कि इसे थोड़ी देर के लिए दूल्हा बनाकर विवाह की रस्में पूरी करा ली जाएँ।

भाग ४: राजकुमारी का विवाह

उन्होंने मामा से कहा, "इस बालक को दूल्हा बनने दो, बदले में बहुत धन देंगे।" मामा लालच में आ गए और बालक मान गया। विवाह की रस्में पूरी हुईं। विदा के समय बालक ने राजकुमारी की चुनरी के पल्लू पर लिख दिया, "तुम्हारा विवाह मुझसे हुआ है, पर जिसके साथ तुम्हें भेजा जाएगा वह एक आँख का काना है। मैं तो काशी पढ़ने जा रहा हूँ।" राजकुमारी ने जब यह पढ़ा तो उसने काने राजकुमार के साथ जाने से मना कर दिया और बारात लौट गई।

भाग ५: बारह वर्ष की आयु और शिव कृपा

उधर मामा और भांजा काशी पहुँचे। बालक ने वहाँ पढ़ाई शुरू की। जब वह बारह वर्ष का हुआ तो एक दिन यज्ञ करके ब्राह्मणों को भोजन कराया। उसी रात उसकी तबीयत बिगड़ गई और उसके प्राण निकल गए। मामा ने उसे देखकर बहुत विलाप किया।

उसी समय शिव-पार्वती आकाश मार्ग से वहाँ से गुज़र रहे थे। पार्वती जी ने रोने की आवाज़ सुनी और शिवजी से पूछा, "यह कौन रो रहा है?" शिवजी ने देखा और बोले, "यह तो उसी साहूकार का पुत्र है जिसे मैंने बारह वर्ष की आयु दी थी।" पार्वती बोलीं, "प्रभु, उसके माता-पिता ने आपकी बहुत भक्ति की है। इसके प्राण लौटा दीजिए, नहीं तो उसके पिता भी जीवित नहीं रहेंगे।"

शिवजी ने कहा, "इसके पिता की भक्ति और व्रत के प्रभाव से मैं इसे और आयु देता हूँ।" बालक जीवित हो उठा। मामा और भांजे ने शिव को प्रणाम किया और पढ़ाई पूरी करके घर की ओर चल पड़े।

भाग ६: घर वापसी

लौटते हुए वे उसी नगर में पहुँचे जहाँ बालक का विवाह हुआ था। राजा ने उसे पहचान लिया और धूमधाम से अपनी पुत्री के साथ विदा किया। इधर साहूकार और उसकी पत्नी ने सोच लिया था कि यदि बेटा नहीं लौटा तो हम दोनों अपने प्राण त्याग देंगे। तभी बेटे के लौटने का समाचार आया। वे दौड़कर आए और पुत्र को पुत्रवधू के साथ देखकर बहुत प्रसन्न हुए।

उस रात शिवजी ने साहूकार को स्वप्न में कहा, "तुम्हारी भक्ति से प्रसन्न होकर मैंने तुम्हारे पुत्र को दीर्घायु दी है।" जो भी सोमवार का व्रत करता है और यह कथा सुनता है, उसकी सब मनोकामनाएँ पूरी होती हैं।

सोलह सोमवार की मान्यता

कुछ घरों में एक अन्य कथा भी सुनाई जाती है, जिसमें माता पार्वती ने सोलह सोमवार का व्रत करके कार्तिकेय को प्रसन्न किया, और कार्तिकेय के प्रभाव से उनके रूठे मित्र ब्राह्मण का मन बदल गया। इस कथा में सोलह सोमवार के व्रत से मनचाहा जीवनसाथी मिलने की मान्यता बताई जाती है।

इति सोमवार व्रत कथा संपूर्ण