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पारंपरिक कथा (पुनर्कथन)
भाग १: केशवदत्त और संतान की चाह
प्राचीन काल में एक नगर में केशवदत्त नाम का ब्राह्मण अपनी पत्नी के साथ रहता था। उनके पास धन की कमी नहीं थी, पर उनके कोई संतान नहीं थी। इस कारण दोनों दुखी रहते थे। ब्राह्मण हर मंगलवार हनुमान जी के मंदिर जाता, पूजा करता और संतान के लिए प्रार्थना करता। उसकी पत्नी भी मंगलवार का व्रत रखती थी।
भाग २: ब्राह्मणी का निराहार व्रत
एक मंगलवार को ब्राह्मणी ने व्रत किया और हनुमान जी के लिए भोग बनाया। पर किसी कारण वह भोग नहीं लगा पाई और स्वयं भी भूखी रह गई। उसने प्रण किया कि जब तक हनुमान जी को भोग नहीं लगाऊँगी, अन्न-जल ग्रहण नहीं करूँगी। अगला मंगलवार आने तक वह निराहार रही। छठे दिन भूख और कमज़ोरी से वह बेहोश होकर गिर गई।
उसकी भक्ति देखकर हनुमान जी प्रसन्न हुए। वे एक ऋषि के रूप में उसके घर आए और बोले, "बेटी, तुम्हारी भक्ति से मैं प्रसन्न हूँ। माँगो, क्या चाहिए?" ब्राह्मणी ने हाथ जोड़कर कहा, "प्रभु, मुझे संतान चाहिए। मेरी गोद सूनी है।" हनुमान जी ने उसे आशीर्वाद दिया, "तुम्हारे घर एक तेजस्वी पुत्र जन्म लेगा, जो सारे कुल का नाम रोशन करेगा। उसका नाम मंगल रखना।" यह कहकर वे अंतर्धान हो गए।
भाग ३: पुत्र मंगल का जन्म
कुछ समय बाद ब्राह्मणी ने एक सुंदर पुत्र को जन्म दिया। ब्राह्मण ने उसका नाम मंगल रखा। वह बालक सुंदर और बुद्धिमान था। दोनों उससे बहुत स्नेह करते थे।
एक दिन ब्राह्मण ने पत्नी से पूछा, "यह सब कैसे हुआ?" ब्राह्मणी ने उन्हें अपनी पूरी बात बताई। ब्राह्मण ने कहा, "हम कभी हनुमान जी का व्रत नहीं छोड़ेंगे।" पर कुछ समय बाद ब्राह्मण को किसी काम से बाहर जाना पड़ा। उसकी अनुपस्थिति में ब्राह्मणी ने मंगलवार को व्रत करना छोड़ दिया और घर के कामों में लग गई।
भाग ४: व्रत में चूक और सुधार
पुत्र मंगल को कई बार चोट लगी और घर पर संकट आने लगे। एक दिन ब्राह्मण का मित्र आया और उसने कहा, "तुमने पुत्र के मंगल नाम को भी भुला दिया। हनुमान जी के व्रत में कमी आई है, इसी कारण यह कष्ट है।" ब्राह्मणी को अपनी भूल का अहसास हुआ। उसने पुनः श्रद्धा से मंगलवार का व्रत करना शुरू किया और हनुमान जी से क्षमा माँगी।
हनुमान जी प्रसन्न हुए। उनके आशीर्वाद से पुत्र मंगल की सारी बाधाएँ दूर हो गईं। वह बड़ा हुआ तो पूरे नगर में उसकी कीर्ति फैल गई। ब्राह्मण दंपत्ति ने आजीवन मंगलवार का व्रत किया और अंत में हनुमान जी की कृपा से सुखपूर्वक जीवन बिताकर परम धाम को गए।
भाग ५: कथा की सीख
इस कथा से सीख मिलती है कि जो भक्त नियमपूर्वक और विश्वास के साथ मंगलवार का व्रत करता है, हनुमान जी उसके संकट हर लेते हैं।
इति मंगलवार व्रत कथा संपूर्ण