📖 व्रत कथा
करवा चौथ व्रत कथा

करवा चौथ व्रत कथा

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पारंपरिक कथा (पुनर्कथन)

भाग १: वीरावती का पहला करवा चौथ

प्राचीन काल में एक नगर में एक साहूकार रहता था। उसके सात बेटे थे और वीरावती नाम की एक सुंदर बेटी। सातों भाई अपनी इकलौती बहन से बहुत प्रेम करते थे। वे उसे अपने साथ बैठाकर खिलाते, और जब तक वह भोजन नहीं करती, वे भी नहीं खाते थे।

वीरावती का विवाह एक योग्य युवक से हुआ। विवाह के बाद पहली बार करवा चौथ आई तो वह मायके आई हुई थी। उसने भाभियों के साथ करवा चौथ का व्रत रखा। पर वीरावती बहुत कोमल थी और उसे भूख-प्यास सहन नहीं हुई। दिन ढलते-ढलते वह बेहाल हो गई और बेहोश सी होने लगी।

भाग २: भाइयों का छल और टूटा व्रत

भाइयों से अपनी बहन की यह हालत देखी न गई। उन्होंने सोचा कि बहन को किसी तरह भोजन करा दें। उन्होंने एक उपाय निकाला। एक भाई ने पेड़ के पीछे जाकर एक बड़ा दीपक जला दिया और उसके आगे छलनी लगा दी। दूसरे भाई ने आकर कहा, "बहन, देखो चंद्रमा निकल आया है। अर्घ्य देकर व्रत खोल लो।"

भोली वीरावती भाइयों की बात पर विश्वास कर गई। उसने उस दीपक को चंद्रमा समझा, अर्घ्य दिया और भोजन करने बैठ गई। पहले ही कौर में उसे छींक आ गई। दूसरे कौर में बाल निकल आया। और तीसरा कौर मुँह में डालते ही ससुराल से खबर आई कि उसके पति गंभीर रूप से बीमार हो गए हैं और उनकी साँस थम गई है।

भाग ३: माता पार्वती का मार्गदर्शन

वीरावती बदहवास होकर ससुराल की ओर भागी। रास्ते में उसे माता पार्वती मिलीं। उन्होंने उसे रोककर कहा, "बेटी, तूने बिना चंद्रमा देखे व्रत तोड़ दिया है, इसी कारण तुझे यह कष्ट मिला है।" वीरावती ने रोते हुए क्षमा माँगी और बोली, "माँ, मुझसे भूल हुई। मैं अनजाने में भाइयों की बात पर विश्वास कर गई। मुझे मेरे पति का जीवन लौटा दीजिए।"

माता पार्वती ने करुणा से कहा, "तू फिर से पूरे विधान के साथ करवा चौथ का व्रत कर। इस बार भूल मत करना।" वीरावती ससुराल पहुँची। उसने पति के निर्जीव शरीर की सेवा पूरे वर्ष की, और प्रत्येक चतुर्थी का व्रत करती रही। उसने शरीर पर उगने वाली सुइयों जैसी घास की नोकें एक-एक करके निकालीं और उन्हें सँभाल कर रखा।

भाग ४: अगले वर्ष का व्रत और पति का जीवन

अगले वर्ष कार्तिक कृष्ण चतुर्थी आई तो उसने पूरी श्रद्धा से, नियमपूर्वक और बिना किसी भूल के करवा चौथ का व्रत किया। चंद्रमा के सच में उदय होने पर ही उसने अर्घ्य दिया। उस रात उसकी निष्ठा से प्रसन्न होकर माता पार्वती ने उसके पति को पुनः जीवन दे दिया। उसका पति उठ बैठा और परिवार में खुशी की लहर दौड़ गई।

तभी से कहा जाता है कि जो स्त्री श्रद्धा, नियम और सच्चे मन से करवा चौथ का व्रत करती है, उसका सुहाग अटल रहता है और उसे अखंड सौभाग्य का वरदान मिलता है।

करवा नाम की एक और कथा

कुछ स्थानों पर करवा नाम की एक पतिव्रता स्त्री की कथा भी सुनाई जाती है। करवा अपने पति के साथ नदी किनारे एक गाँव में रहती थी। एक दिन उसका पति नदी में स्नान कर रहा था कि एक मगरमच्छ ने उसका पैर पकड़ लिया और उसे खींचने लगा। पति ने "करवा! करवा!" पुकारा। करवा दौड़ती हुई आई और उसने कच्चे सूत से मगरमच्छ को बाँध दिया। फिर वह मगरमच्छ को लेकर यमराज के पास पहुँची और बोली, "इस मगर ने मेरे पति को पकड़ा है, इसे दंड दीजिए और मेरे पति को दीर्घायु दीजिए।" यमराज ने कहा, "मैं ऐसा नहीं कर सकता।" तब करवा ने कहा, "यदि आप ऐसा नहीं करेंगे, तो मैं शाप दे दूँगी।" उसके पातिव्रत्य के तेज से भयभीत होकर यमराज ने मगर को यमलोक भेज दिया और उसके पति को दीर्घायु का वरदान दिया। इसी कारण यह दिन करवा चौथ के नाम से प्रसिद्ध हुआ।

इति करवा चौथ व्रत कथा संपूर्ण