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पारंपरिक कथा (पुनर्कथन)
भाग १: भीमसेन की व्यथा
महाभारत काल की बात है। पांडवों में दूसरे भाई भीमसेन अपने विशाल शरीर और अपार बल के लिए प्रसिद्ध थे। उनके पेट में 'वृक' नाम की एक तीव्र अग्नि थी, इसलिए उन्हें भोजन बहुत अधिक चाहिए होता था। वे एक पल भी भूखे नहीं रह सकते थे। इसी कारण उन्हें 'वृकोदर' भी कहा जाता था।
उनके सब भाई, माता कुंती और पत्नी द्रौपदी हर माह नियम से दोनों एकादशियों का व्रत करते थे। केवल भीम ही ऐसे थे जो यह व्रत नहीं कर पाते थे। वे इस बात से मन ही मन बहुत दुखी रहते थे। उन्हें लगता था कि मैं भगवान विष्णु का भक्त होकर भी उनके प्रिय व्रत से वंचित रह जाता हूँ और इस कारण पाप का भागी बनूँगा।
भाग २: वेदव्यास से प्रश्न
एक दिन भीमसेन महर्षि वेदव्यास के आश्रम पहुँचे। उन्होंने चरणों में प्रणाम करके कहा, "गुरुदेव, मेरे भाई, माता और द्रौपदी सब एकादशी का व्रत करते हैं और मुझसे भी कहते हैं कि तुम भी व्रत करो। पर मैं भूख सहन नहीं कर पाता। मैं दान दे सकता हूँ, भगवान की पूजा भी कर सकता हूँ, किंतु उपवास मुझसे नहीं होता। कृपा करके कोई ऐसा उपाय बताइए जिससे मुझे एकादशी का पूरा फल बिना हर माह उपवास किए मिल जाए।"
महर्षि वेदव्यास ने स्नेह से कहा, "भीम, यदि तुम स्वर्ग का सुख और नरक से मुक्ति चाहते हो, तो दोनों पक्षों की एकादशी का व्रत करो।" भीम बोले, "गुरुदेव, यही तो मुझसे नहीं हो पाता। यदि वर्ष में कोई एक ही व्रत हो, तो मैं उसे अवश्य कर लूँगा। कृपा करके ऐसा कोई एक व्रत बताइए।"
भाग ३: निर्जला व्रत का उपाय
तब व्यासजी ने कहा, "वत्स, ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी का व्रत तुम बिना अन्न और जल के करो। उस दिन केवल आचमन के लिए जल ग्रहण करना, इससे अधिक नहीं। यदि तुम सूर्योदय से सूर्योदय तक निर्जल रहकर यह व्रत करोगे, तो तुम्हें वर्ष भर की चौबीस एकादशियों का फल प्राप्त होगा।"
भाग ४: भीम का व्रत और उसका फल
यह सुनकर भीम घबराए नहीं। उन्होंने दृढ़ निश्चय किया और ज्येष्ठ शुक्ल एकादशी को बिना अन्न-जल के पूरा व्रत किया। जेठ की तपती गर्मी में भूख और प्यास से उनका शरीर शिथिल हो गया और वे मूर्छित जैसे हो गए, पर उन्होंने अपना संकल्प नहीं तोड़ा। उनके भाइयों और द्रौपदी ने भी उन्हें सँभाले रखा। अगले दिन द्वादशी को भीम ने स्नान करके भगवान विष्णु का पूजन किया, ब्राह्मणों को भोजन कराया और दान दिया और फिर स्वयं पारण किया।
कहा जाता है कि उसी दिन से यह तिथि 'पांडव एकादशी' और 'भीमसेनी एकादशी' के नाम से प्रसिद्ध हुई। जो व्यक्ति इस एकादशी को पूरे नियम से व्रत करता है, जल और अन्न का दान करता है और भगवान विष्णु का स्मरण करता है, उसके पाप धुल जाते हैं और उसे विष्णुधाम की प्राप्ति होती है।
इति निर्जला एकादशी कथा संपूर्ण