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पारंपरिक कथा (पुनर्कथन)
भाग १: ब्राह्मणी और अनाथ राजकुमार
प्राचीन काल में एक नगर में एक गरीब ब्राह्मणी रहती थी। उसके पति का देहांत हो चुका था और उसका एक छोटा पुत्र था। विधवा ब्राह्मणी प्रतिदिन अपने पुत्र के साथ भिक्षा माँगने जाती और जो मिलता उसी से जीवन चलाती थी।
एक दिन भिक्षा से लौटते समय रास्ते में उसे एक बालक घायल अवस्था में मिला। वह बहुत सुंदर और तेजस्वी था, पर उसके शरीर पर चोटें थीं। ब्राह्मणी को उस पर दया आ गई। वह उसे घर ले आई, उसकी सेवा की और अपने पुत्र के समान उसका पालन करने लगी। वह बालक विदर्भ देश का राजकुमार था। शत्रु राजा ने उसके पिता को हराकर राज्य छीन लिया था और राजा मारा गया था। राजकुमार अनाथ होकर भटक रहा था।
भाग २: शांडिल्य ऋषि और प्रदोष व्रत
ब्राह्मणी अपने दोनों पुत्रों का पालन करती रही। एक दिन वह शांडिल्य ऋषि के आश्रम गई और उनके दर्शन किए। ऋषि ने उसे प्रदोष व्रत के बारे में बताया और कहा, "तुम त्रयोदशी के दिन प्रदोष काल में भगवान शिव की पूजा करो, इससे तुम्हारे सब कष्ट दूर होंगे।" ब्राह्मणी ने ऋषि की आज्ञा मानी और दोनों बालकों के साथ नियम से प्रदोष व्रत करने लगी।
भाग ३: अंशुमती से भेंट
कुछ समय बाद दोनों बालक वन में खेलने गए। वहाँ राजकुमार ने कुछ गंधर्व कन्याओं को देखा। उनमें से एक कन्या का नाम अंशुमती था। राजकुमार उससे बातें करने लगा और वे एक-दूसरे से परिचित हुए। अंशुमती ने घर जाकर अपने माता-पिता को राजकुमार के बारे में बताया। अगले दिन गंधर्वराज ने भी राजकुमार को देखा। भगवान शिव ने गंधर्वराज को स्वप्न में आज्ञा दी कि अपनी कन्या का विवाह इस राजकुमार से कर दो। गंधर्वराज ने वैसा ही किया।
भाग ४: राज्य की पुनः प्राप्ति
अंशुमती से विवाह होने के बाद राजकुमार ने गंधर्वों की विशाल सेना की सहायता से विदर्भ पर आक्रमण किया। उसने शत्रु राजा को पराजित किया और अपने पिता का राज्य फिर प्राप्त कर लिया। वह राजा बना और उसने उस ब्राह्मणी के पुत्र को अपना मंत्री बनाया। ब्राह्मणी को भी सम्मान सहित राजभवन में रखा गया।
भाग ५: व्रत की महिमा
एक दिन अंशुमती ने राजा से पूछा, "यह सब कैसे हुआ?" राजा ने कहा, "यह सब प्रदोष व्रत और भगवान शिव की कृपा का फल है।" तभी से प्रदोष व्रत की महिमा संसार में फैली। जो भी श्रद्धा से प्रदोष व्रत करता है, उसके सब दुख मिट जाते हैं, कर्ज और रोग दूर होते हैं, और उसे सुख-शांति मिलती है।
इति प्रदोष व्रत कथा संपूर्ण