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पारंपरिक कथा (पुनर्कथन)
भाग १: नौ ग्रहों का विवाद
एक बार नौ ग्रहों में यह विवाद हुआ कि सबमें श्रेष्ठ कौन है। सूर्य, चंद्र, मंगल, बुध, बृहस्पति, शुक्र, शनि, राहु और केतु, सबने अपनी-अपनी श्रेष्ठता का दावा किया। जब आपस में निर्णय नहीं हुआ तो वे देवराज इंद्र के पास गए। इंद्र असमंजस में पड़ गए और बोले, "मैं इसका निर्णय नहीं कर सकता। चलो पृथ्वी पर राजा विक्रमादित्य के पास चलते हैं, वे न्यायप्रिय हैं।"
भाग २: विक्रमादित्य का न्याय
सब ग्रह विक्रमादित्य के दरबार में पहुँचे। राजा ने उनकी बात सुनी और सोचा कि किसी एक को श्रेष्ठ कहने पर बाकी रुष्ट होंगे। उसने नौ आसन बनवाए: स्वर्ण, रजत, कांस्य, पीतल, सीसा, राँगा, ताँबा, अभ्रक और लोहा। उसने कहा, "सबको क्रम से इन पर बैठना होगा। जिसका आसन जितना पहले होगा, वह उतना श्रेष्ठ।" शनि को लोहे का आसन मिला जो सबसे अंतिम था।
शनि देव ने क्रोधित होकर कहा, "राजन, तुमने मेरा अपमान किया है। मैं ढाई वर्ष से साढ़े सात वर्ष तक लोगों को दंड देता हूँ। अब तुम भी मेरे प्रकोप को झेलो।" राजा ने विनम्रता से कहा, "जो भाग्य में होगा, वह होगा।"
भाग ३: साढ़ेसाती की परीक्षा
कुछ समय बाद शनि की साढ़ेसाती राजा पर आरंभ हुई। शनि घोड़े के व्यापारी के वेश में आए और राजा को एक सुंदर घोड़ा बेच गए। राजा जैसे ही घोड़े पर सवार हुआ, घोड़ा उसे उड़ाकर दूर जंगल में ले गया और गायब हो गया। राजा जंगल में भटकता रहा। भूख-प्यास से व्याकुल होकर वह एक नगर में पहुँचा। वहाँ एक सेठ ने उसे आश्रय दिया, पर उसी रात सेठ के घर से हार चोरी हो गया और आरोप राजा पर लगा। नगर के राजा ने उसके हाथ-पैर कटवाने की आज्ञा दे दी।
राजा विक्रमादित्य हाथ-पैर विहीन होकर एक तेली के घर पहुँचे। तेली ने उन्हें अपने कोल्हू पर बैठने का काम दिया। राजा वहाँ बैठा रहा और शनि देव की आराधना करता रहा। एक दिन रात को उसने मल्हार राग गाया। उस राग को सुनकर उस नगर की राजकुमारी मोहित हो गई। उसने पता लगाया कि गायक कौन है, और विक्रमादित्य से विवाह करने का हठ किया। राजा ने मना किया, पर राजकुमारी अडिग रही। अंत में विवाह हो गया।
भाग ४: क्षमा और व्रत का प्रचलन
एक रात शनि देव ने स्वप्न में आकर कहा, "विक्रम, तूने मेरा अपमान किया था, अब तेरी परीक्षा पूरी हुई।" राजा ने विनम्रता से उनके चरणों में प्रणाम किया और कहा, "प्रभु, मैंने अनजाने में आपका अपमान किया था। कृपा करके क्षमा कर दीजिए। कृपा कर ऐसा कष्ट किसी और को मत दीजिए।" शनि ने उसे क्षमा किया और उसके हाथ-पैर पहले जैसे हो गए।
राजा अपने राज्य लौटा और प्रजा से बोला, "आज से शनिवार को शनि देव की पूजा और व्रत किया जाए।" उसने आदेश दिया कि शनि की कथा हर शनिवार को पढ़ी और सुनी जाए। तभी से शनिवार का व्रत प्रचलित हुआ।
जो व्यक्ति श्रद्धा से शनिवार का व्रत करता है और यह कथा सुनता है, उसे शनि की पीड़ा से राहत मिलती है और उसके कार्यों में सफलता मिलती है।
इति शनि देव व्रत कथा संपूर्ण