📖 व्रत कथा
संकष्टी (सकट) चौथ व्रत कथा

संकष्टी (सकट) चौथ व्रत कथा

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पारंपरिक कथा (पुनर्कथन)

भाग १: कुम्हार का आवा

एक नगर में एक कुम्हार रहता था। वह मिट्टी के बर्तन बनाता और उन्हें आग में पकाता था, जिसे 'आवा' कहते हैं। एक बार उसने बहुत से बर्तन बनाए, पर जब उसने उन्हें आवा में पकाने के लिए डाला तो वे ठीक से पक नहीं रहे थे। हर बार कच्चे रह जाते। कुम्हार बहुत परेशान हुआ और नगर के राजा के पास गया।

भाग २: राजा की आज्ञा

उसने कहा, "महाराज, मेरे बर्तन किसी भी तरह नहीं पकते। मेरा रोज़गार संकट में है।" राजा ने अपने राजपंडित को बुलाया। पंडित ने विचार करके कहा, "महाराज, यदि प्रत्येक बार आवा लगाते समय एक बालक की बलि दी जाए तो बर्तन पक जाएँगे।"

राजा ने आज्ञा दी कि नगर के हर घर से बारी-बारी एक बालक आवा में भेजा जाए। इस नियम से नगर के परिवारों में हाहाकार मच गया। धीरे-धीरे कई घरों के बच्चे चले गए। अंत में एक बूढ़ी माँ की बारी आई, जिसका एक ही पुत्र था। वही उसके जीवन का सहारा था।

भाग ३: बुढ़िया का बेटा और सकट व्रत

बुढ़िया बहुत रोई, पर राजा की आज्ञा का पालन तो करना ही था। उसने बेटे को सकट माता (गणेश जी) की पूजा के लिए सुपारी और दूब देकर कहा, "बेटा, जब तुम्हें आवा में बैठाया जाए, तो गणेश जी का नाम लेना और इस सुपारी और दूब को साथ रखना। भगवान तुम्हारी रक्षा करेंगे।" उस दिन माघ मास की कृष्ण चतुर्थी थी।

बालक को आवा में बैठा दिया गया। माँ घर आकर पूरी रात गणेश जी से प्रार्थना करती रही। उसने सकट का व्रत रखा, तिलकुट बनाया और रात भर गणेश जी का नाम लेती रही। सुबह कुम्हार आवा देखने गया तो उसे बड़ा आश्चर्य हुआ। सारे बर्तन पूरी तरह पक चुके थे, और बुढ़िया का बालक सुरक्षित और हँसता हुआ बैठा था। आवा में आग जलकर शांत हो गई थी, उसे कोई चोट नहीं आई थी। इसके अलावा जिन बालकों की बलि दी गई थी, वे भी जीवित होकर अपनी-अपनी माँ के पास लौट आए।

भाग ४: चमत्कार और व्रत की शुरुआत

यह चमत्कार देखकर राजा ने कुम्हार और बुढ़िया को बुलाया। बुढ़िया ने सारी बात बताई कि कैसे उसने सकट चौथ का व्रत और गणेश जी की पूजा की। राजा ने नगर में घोषणा करवाई कि अब से हर माँ अपनी संतान की रक्षा के लिए माघ कृष्ण चतुर्थी को सकट का व्रत रखेगी।

तभी से सकट चौथ का व्रत प्रचलित हुआ। कहा जाता है कि जो माँ श्रद्धा से यह व्रत करती है, गणेश जी उसकी संतान के सारे संकट हर लेते हैं। बोलो गणपति बप्पा मोरया!

तिलकुटा की एक और मान्यता

कुछ क्षेत्रों में इस दिन गणेश जी और चंद्रमा की एक अन्य कथा सुनाई जाती है, जिसमें गणेश जी के जन्म पर शंकर जी द्वारा उनका शीश काटने और हाथी का सिर लगाने की कथा के साथ बताया जाता है कि चतुर्थी को पूजा से संकट कटते हैं। कुछ स्थानों पर 'सकट माता' की कथा के रूप में इसे कहा जाता है। पूरे उत्तर भारत में तिल-गुड़ के पकवान की परंपरा आज भी समान है।

इति सकट चौथ कथा संपूर्ण