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पारंपरिक कथा (पुनर्कथन)
भाग १: कंस का अत्याचार
द्वापर युग में मथुरा नगरी पर उग्रसेन नाम के राजा राज्य करते थे। उनका पुत्र कंस बहुत बलवान, किंतु क्रूर और अहंकारी था। उसने सत्ता के लोभ में अपने पिता उग्रसेन को बंदी बनाकर कारागार में डाल दिया और स्वयं राजा बन बैठा। प्रजा उसके अत्याचार से त्रस्त हो गई।
भाग २: आकाशवाणी
कंस की एक बहन थी देवकी। वह उसे बहुत प्रेम करता था। देवकी का विवाह वसुदेव से तय हुआ। विवाह के बाद कंस स्वयं रथ हाँकते हुए अपनी बहन को ससुराल विदा करने चला। तभी आकाशवाणी हुई, "हे कंस, तू जिस बहन को इतने स्नेह से विदा कर रहा है, उसकी आठवीं संतान तेरा काल बनेगी।"
यह सुनते ही कंस का प्रेम क्रोध में बदल गया। उसने देवकी को मारने के लिए तलवार निकाली। वसुदेव ने हाथ जोड़कर कहा, "कंस, देवकी का क्या दोष है? इसे मत मारो। हम तुम्हें इसकी हर संतान जन्म लेते ही सौंप देंगे।" कंस ने वसुदेव की बात मान ली, पर दोनों को कारागार में बंद कर दिया।
भाग ३: कारागार में संतानें
कारागार में देवकी की पहली संतान जन्मी। वसुदेव ने अपने वचन के अनुसार उसे कंस को सौंप दिया। कंस ने उसे मार डाला। इस प्रकार उसने छह संतानों को मार दिया। सातवीं संतान के रूप में भगवान की शेष माया से गर्भ को रोहिणी के गर्भ में स्थानांतरित कर दिया गया, जिससे बलराम का जन्म हुआ। लोगों में कहा गया कि देवकी का गर्भ गिर गया।
भाग ४: श्रीकृष्ण का जन्म
भाद्रपद कृष्ण अष्टमी की मध्य रात्रि को रोहिणी नक्षत्र में देवकी की आठवीं संतान के रूप में स्वयं भगवान विष्णु ने कृष्ण रूप में जन्म लिया। उसी समय कारागार में दिव्य प्रकाश फैल गया। वसुदेव और देवकी ने देखा कि सामने चतुर्भुज रूप में शंख, चक्र, गदा और पद्म धारण किए भगवान खड़े हैं। उन्होंने हाथ जोड़कर प्रणाम किया। भगवान ने कहा, "मुझे नंद बाबा के घर गोकुल पहुँचा दो और वहाँ जन्मी कन्या को यहाँ ले आओ।" यह कहकर वे एक सामान्य शिशु बन गए।
भाग ५: यमुना पार गोकुल
उसी समय कारागार के सारे पहरेदार गहरी नींद में सो गए। वसुदेव की बेड़ियाँ अपने आप खुल गईं। कारागार के सारे द्वार अपने आप खुल गए। वसुदेव ने नवजात कृष्ण को एक टोकरी में रखा और सिर पर उठाकर गोकुल की ओर चल पड़े।
बाहर घनघोर वर्षा हो रही थी। यमुना नदी उफान पर थी। वसुदेव जब यमुना के किनारे पहुँचे तो वे चिंतित हो गए। पर जैसे ही उन्होंने जल में पैर रखा, यमुना ने अपना जल शांत कर लिया और रास्ता दे दिया। शेषनाग ने अपने फन फैलाकर बारिश से शिशु की रक्षा की। यमुना ने श्रीकृष्ण के चरण स्पर्श करने के लिए अपना जल ऊपर उठाया और फिर शांत होकर रास्ता दे दिया।
वसुदेव गोकुल पहुँचे। वहाँ नंद बाबा के घर यशोदा ने एक कन्या को जन्म दिया था और वे गहरी नींद में थीं। वसुदेव ने कृष्ण को यशोदा के पास सुला दिया और कन्या को लेकर लौट आए। कारागार में पहुँचते ही द्वार फिर बंद हो गए, बेड़ियाँ वापस लग गईं और पहरेदार जाग गए।
भाग ६: कंस और योगमाया
कन्या के रोने की आवाज़ सुनकर पहरेदार दौड़े और कंस को समाचार दिया। कंस दौड़ा आया और देवकी के हाथ से कन्या छीन ली। उसने उसे शिला पर पटकने की कोशिश की, पर कन्या उसके हाथ से छूटकर आकाश में उड़ गई और दिव्य रूप में प्रकट होकर बोली, "हे कंस, तुझे मारने वाला तो कहीं और जन्म ले चुका है और सुरक्षित है।" यह कहकर वह अंतर्धान हो गई।
भाग ७: गोकुल का उत्सव और कंस का अंत
कंस भय और क्रोध से भर गया। उधर गोकुल में नंद और यशोदा के आँगन में कृष्ण के जन्म का उत्सव मनाया जाने लगा। गोकुलवासियों ने नाच-गाकर खुशियाँ मनाईं। बाद में कृष्ण ने कंस के भेजे हुए पूतना, शकटासुर और तृणावर्त जैसे राक्षसों का संहार किया और अंततः मथुरा जाकर कंस का वध किया। उन्होंने उग्रसेन को पुनः राजा बनाया और माता-पिता को कारागार से मुक्त कराया।
तभी से भाद्रपद कृष्ण अष्टमी को श्रीकृष्ण जन्मोत्सव के रूप में मनाया जाता है। जो भक्त इस दिन श्रद्धा से व्रत और पूजन करता है और कथा सुनता है, उसके सब पाप कट जाते हैं और उसे भगवान कृष्ण की कृपा प्राप्त होती है।
इति जन्माष्टमी कथा संपूर्ण