📖 व्रत कथा
धनतेरस कथा (धन्वंतरि और यमदीप)

धनतेरस कथा (धन्वंतरि और यमदीप)

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पारंपरिक कथा (पुनर्कथन)

भाग १: समुद्र मंथन और धन्वंतरि

पुराणों के अनुसार देवताओं और असुरों ने अमृत पाने के लिए समुद्र मंथन किया। मंथन में अनेक रत्न निकले, जिनमें लक्ष्मी जी भी प्रकट हुईं। अंत में हाथ में अमृत से भरा कलश लिए भगवान धन्वंतरि प्रकट हुए। वे आयुर्वेद के देवता माने जाते हैं। जिस दिन वे प्रकट हुए, उसे धनतेरस के रूप में मनाया जाता है।

भाग २: राजा हिम का पुत्र

एक पुरानी कथा में राजा हिम के पुत्र की कुंडली में लिखा था कि विवाह के चौथे दिन साँप के डसने से उसकी मृत्यु हो जाएगी। जिस दिन उसका विवाह हुआ, चौथे दिन की रात उसकी पत्नी को इस बात का पता चल गया। वह बहुत बुद्धिमान थी। उसने तय किया कि वह अपने पति को बचाएगी।

भाग ३: नवविवाहिता की युक्ति

उसने उस रात पति को सोने नहीं दिया। कमरे के द्वार पर उसने अपने सारे गहने, सोने-चाँदी के सिक्के और रत्न ढेर बनाकर रख दिए और हर ओर दीपक जला दिए। फिर वह पति को जगाए रखने के लिए सुंदर कहानियाँ और गीत सुनाती रही।

भाग ४: यमराज का लौटना

आधी रात को यमराज साँप का रूप धरकर वहाँ पहुँचे। द्वार पर रखे आभूषणों और दीपकों की चमक से उनकी आँखें चौंधिया गईं और वे भीतर नहीं जा सके। वे वहीं ढेर पर बैठ गए और रानी के गीत और कहानियाँ सुनते रहे। सुबह होते ही वे चुपचाप लौट गए। इस तरह राजकुमार की रक्षा हुई। तभी से धनतेरस पर यमराज के नाम का दीपक जलाया जाता है।

इति धनतेरस कथा संपूर्ण