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पारंपरिक कथा (पुनर्कथन)
भाग १: साहूकार की बेटी और स्याहु
प्राचीन काल में एक नगर में एक साहूकार रहता था। उसके सात पुत्र और एक पुत्री थी। दीपावली से कुछ दिन पहले पुत्री मायके आई हुई थी। घर लीपने के लिए उसकी भाभियाँ जंगल में मिट्टी खोदने गईं, तो वह भी उनके साथ चली गई। मिट्टी खोदते समय उसकी खुरपी से अनजाने में एक स्याहु (साही) का बच्चा मर गया। स्याहु ने क्रोध से कहा, "मैं तेरी कोख बाँध दूँगी।"
भाग २: भाभी का साहस
लड़की बहुत घबरा गई। उसने अपनी भाभियों से कहा कि कोई मेरी जगह अपनी कोख बँधवा ले। बड़ी भाभियाँ डर गईं, पर सबसे छोटी भाभी ने ननद की रक्षा के लिए यह जिम्मेदारी ले ली। उसके बाद उसके जो भी बच्चे होते, वे सात दिन के अंदर ही मर जाते। इस तरह उसके सात पुत्र चले गए।
भाग ३: सुरही गाय की सेवा
दुखी होकर उसने एक पंडित से पूछा। पंडित ने कहा, "तुम सुरही गाय की सेवा करो। वह स्याहु की सहेली है और तुम्हारी सहायता कर सकती है।" बहू रोज़ सुबह उठकर गाय के नीचे की सफ़ाई करती और सेवा करती। एक दिन गाय ने प्रसन्न होकर पूछा कि तू क्या चाहती है, तब बहू ने अपनी पूरी बात बताई। सुरही गाय उसे स्याहु के पास ले चली।
भाग ४: गरुड़ के बच्चे की रक्षा
रास्ते में थककर वे एक पेड़ के नीचे बैठीं। बहू ने देखा कि एक साँप गरुड़ पक्षी के बच्चे को डसने वाला है। उसने साँप को मारकर बच्चे को बचा लिया। तभी गरुड़ पक्षी लौटी और खून देखकर समझी कि बहू ने उसके बच्चे को मारा है। बहू ने सच बताया, तो गरुड़ पक्षी बहुत प्रसन्न हुई और उसे स्याहु के पास तक पहुँचा दिया।
भाग ५: स्याहु का आशीर्वाद
स्याहु ने बहू का सेवा-भाव और सच्चाई देखकर उसे आशीर्वाद दिया। उसने कोख खोल दी और कहा, "तुम्हारे सात पुत्र और सात बहुएँ होंगी।" कुछ ही समय में वैसा ही हुआ। उसका घर सात पुत्रों और सात बहुओं से भर गया। तभी से अहोई माता का व्रत संतान की रक्षा के लिए किया जाता है।
इति अहोई अष्टमी व्रत कथा संपूर्ण