संत तुकाराम महाराष्ट्र के देहू गाँव के वारकरी संत थे। कहा जाता है कि वे पहले छोटा सा व्यापार और साहूकारी करते थे। आगे चलकर उनका मन पूरी तरह विट्ठल भक्ति में लग गया।
लोक परंपरा के अनुसार उनके पास गाँव के गरीब लोगों को दिए कर्ज़ की बही थी। अकाल के समय अनेक लोग वह कर्ज़ चुकाने में असमर्थ थे और उन पर बोझ बना रहता था।
तुकाराम ने सोचा कि मेरी भक्ति में यह बही बाधा है। उन्होंने सारी बही इंद्रायणी नदी में डुबो दी और लोगों से कह दिया कि अब तुम पर कोई ऋण नहीं है।
इसके बाद वे अपना समय अभंग रचने और कीर्तन में बिताने लगे। उनके अभंग आज भी महाराष्ट्र में बड़े प्रेम से गाए जाते हैं।