सूरदास भक्तिकाल के प्रसिद्ध कवि और गायक थे। परंपरा में उन्हें जन्म से या बाल्यकाल से नेत्रहीन माना जाता है। फिर भी उनके पदों में श्रीकृष्ण की बाललीलाओं का इतना जीवंत वर्णन मिलता है कि पाठक आँखों से देख लेता है।
कहा जाता है कि वे वृंदावन और मथुरा के आसपास रहे और वल्लभाचार्य के संपर्क में आए। वहीं उन्होंने श्रीनाथजी की सेवा में भजन गाए।
उनके प्रसिद्ध पदों में माखन चुराते कृष्ण, यशोदा की ममता और गोपियों के प्रेम का सरल और मधुर वर्णन है। "सूरसागर" उनकी प्रमुख रचना मानी जाती है।
लोक कथा है कि एक बार वे कुएँ में गिर गए तो कृष्ण ने उन्हें बचाया और जाते-जाते हाथ छुड़ाकर चले गए। सूरदास ने कहा, "हाथ छुड़ाए जात हौ, निबल जानि कै मोहि। हृदय से जब जाओगे, तब मैं मानूँगा तोहि।"