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सूरदास की कृष्ण भक्ति (Surdas and His Devotion)

नेत्रहीन कवि सूरदास की भक्ति और उनकी वाणी में बसे श्रीकृष्ण की लीलाओं की कथा।

📿 संत-भक्त कथाएँ ⏱ 3 मिनट

सूरदास भक्तिकाल के प्रसिद्ध कवि और गायक थे। परंपरा में उन्हें जन्म से या बाल्यकाल से नेत्रहीन माना जाता है। फिर भी उनके पदों में श्रीकृष्ण की बाललीलाओं का इतना जीवंत वर्णन मिलता है कि पाठक आँखों से देख लेता है।

कहा जाता है कि वे वृंदावन और मथुरा के आसपास रहे और वल्लभाचार्य के संपर्क में आए। वहीं उन्होंने श्रीनाथजी की सेवा में भजन गाए।

उनके प्रसिद्ध पदों में माखन चुराते कृष्ण, यशोदा की ममता और गोपियों के प्रेम का सरल और मधुर वर्णन है। "सूरसागर" उनकी प्रमुख रचना मानी जाती है।

लोक कथा है कि एक बार वे कुएँ में गिर गए तो कृष्ण ने उन्हें बचाया और जाते-जाते हाथ छुड़ाकर चले गए। सूरदास ने कहा, "हाथ छुड़ाए जात हौ, निबल जानि कै मोहि। हृदय से जब जाओगे, तब मैं मानूँगा तोहि।"

🪔 सीख
सच्ची दृष्टि आँखों से नहीं, भाव से मिलती है। श्रद्धा के सहारे कोई भी बाधा पार की जा सकती है।

सूरदास के जीवन के कुछ प्रसंग भक्त-परंपरा पर आधारित हैं। इतिहासकारों के मत भिन्न हो सकते हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

सूरदास की प्रमुख रचना क्या है?
सूरसागर, जिसमें श्रीकृष्ण की लीलाओं के पद हैं।
सूरदास किस काल के कवि थे?
भक्तिकाल के, सोलहवीं शताब्दी के आसपास।
क्या सूरदास के जीवन की कथाएँ प्रमाणित हैं?
कई प्रसंग भक्त-परंपरा पर आधारित हैं और विद्वानों में मतभेद हैं।

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