मीराबाई का जन्म मेड़ता के राजघराने में हुआ। बचपन से ही उन्हें श्रीकृष्ण के प्रति अगाध प्रेम था। परंपरा में कहा जाता है कि बालपन में एक बारात देखकर उन्होंने माँ से पूछा था कि मेरा दूल्हा कौन है, तो माँ ने मज़ाक में श्रीकृष्ण की मूर्ति की ओर इशारा कर दिया था।
उनका विवाह मेवाड़ के राजकुमार भोजराज से हुआ। राजमहल में रहते हुए भी मीरा का मन कृष्ण में ही रमा रहता था। वे भजन गातीं और संतों का सत्संग करतीं, जो ससुराल पक्ष को पसंद नहीं आया।
लोक कथाओं में बताया जाता है कि उन्हें कई प्रकार से परेशान किया गया। पर मीरा ने न किसी से द्वेष किया और न अपनी भक्ति छोड़ी। उनके पद आज भी भजन के रूप में गाए जाते हैं।
मीरा बाद में वृंदावन और द्वारका की ओर चली गईं। परंपरा में कहा जाता है कि द्वारका में वे श्रीकृष्ण की मूर्ति में समा गईं। उनके पदों में सरल भाषा में प्रेम, समर्पण और निर्भयता झलकती है।