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संत रविदास और कठौती में गंगा (Sant Ravidas and the Ganga in a Wooden Bowl)

संत रविदास की प्रसिद्ध उक्ति "मन चंगा तो कठौती में गंगा" की लोककथा, जो मन की शुद्धता और कर्म की महिमा बताती है।

📿 संत-भक्त कथाएँ ⏱ 3 मिनट

संत रविदास काशी में रहकर जूते बनाने का कार्य करते थे और प्रभु-भजन में लीन रहते थे। वे अपने कर्म को ही पूजा मानते थे।

लोककथा है कि एक बार गंगा-स्नान के पर्व पर एक सेठ ने उनसे जूतों की मरम्मत करवाई। रविदास जी ने कहा कि वे पर्व के कारण स्नान को नहीं जा सकेंगे, पर एक कौड़ी गंगा माँ को अर्पित करने के लिए ले जाएँ।

सेठ ने गंगा तट पर वह कौड़ी अर्पित करते हुए कहा, "रविदास जी की यह भेंट स्वीकार करो।" कहा जाता है कि गंगा जी ने स्वयं हाथ बढ़ाकर वह भेंट ग्रहण की और बदले में एक कंगन दिया।

सेठ उस कंगन को राजा को दिखाने को ललचाया। राजा ने उसकी सुंदरता देखकर दूसरा कंगन भी माँग लिया। सेठ ने रविदास जी से दूसरे कंगन की बात की तो वे शांत भाव से बोले, "मन चंगा तो कठौती में गंगा।"

उन्होंने अपनी चमड़ा भिगोने की कठौती में हाथ डाला और परंपरा के अनुसार उसमें से वैसा ही दूसरा कंगन निकल आया। तभी से यह वाक्य लोक में प्रसिद्ध हो गया।

🪔 सीख
तीर्थ या कर्मकांड से अधिक मन की शुद्धता मायने रखती है। कर्म करते हुए ईश्वर को याद रखना भी पूजा है।

यह कथा लोक परंपरा में प्रचलित है। विवरण क्षेत्र और स्रोत के अनुसार भिन्न हो सकते हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

"मन चंगा तो कठौती में गंगा" का अर्थ क्या है?
यदि मन शुद्ध है तो पवित्रता कहीं भी मिल सकती है।
रविदास जी कौन थे?
भक्तिकाल के संत, जिनकी वाणी गुरु ग्रंथ साहिब में भी संकलित है।
क्या यह घटना ऐतिहासिक है?
यह लोक परंपरा की कथा है। विवरण क्षेत्र के अनुसार अलग मिलते हैं।

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