संत ज्ञानेश्वर का जन्म महाराष्ट्र में हुआ। उन्होंने बहुत कम उम्र में ज्ञानेश्वरी जैसी महान रचना की, जो भगवद्गीता की मराठी टीका है। परंपरा में उनके परिवार को समाज की उपेक्षा सहनी पड़ी।
लोककथा है कि एक बार पैठण में कुछ विद्वानों ने ज्ञानेश्वर से कहा कि वेद केवल ब्राह्मणों के लिए हैं। उन्होंने व्यंग्य में कहा, "तुम्हारा नाम तो ज्ञानेश्वर है, तो इस भैंसे का नाम भी ज्ञानेश्वर है। फिर इसमें और तुम में क्या अंतर?"
ज्ञानेश्वर शांत रहे। कहा जाता है कि उन्होंने भैंसे के सिर पर हाथ रखा और वह भैंसा वेद की ऋचाएँ बोलने लगा। सभा में सन्नाटा छा गया और विद्वान लज्जित हुए।
लोक परंपरा में इस प्रसंग को इस भाव से सुनाया जाता है कि ज्ञान और भक्ति का अधिकार सब प्राणियों को है और जन्म से कोई श्रेष्ठ या हीन नहीं होता।