जनाबाई महाराष्ट्र की संत कवयित्री थीं और संत नामदेव के घर में सेवा करती थीं। उनका जीवन सादा था, पर मन हर समय विट्ठल के नाम में रमा रहता था।
घर के काम करते समय, चक्की चलाते हुए और झाड़ू लगाते हुए वे विट्ठल के अभंग गुनगुनाती रहती थीं। उनकी रचनाओं में रोज़मर्रा के कामों का सुंदर वर्णन मिलता है।
लोक कथा कहती है कि जनाबाई की भक्ति से प्रसन्न होकर स्वयं विट्ठल उनके साथ चक्की पीसने बैठ जाते थे। इस कथा का भाव यही है कि जो काम को भक्ति के साथ करता है, ईश्वर उसके साथ होता है।
आज भी जनाबाई के अभंग महाराष्ट्र में बड़े आदर से गाए जाते हैं।