परंपरा के अनुसार आदि शंकराचार्य अद्वैत वेदांत के महान आचार्य थे। एक बार वे काशी में गंगा स्नान के लिए जा रहे थे।
रास्ते में उन्हें एक व्यक्ति मिला, जो अपने कुत्तों के साथ चल रहा था। शंकराचार्य के शिष्यों ने उसे मार्ग से हटने को कहा।
उस व्यक्ति ने शांत भाव से पूछा, "आप किसे हटने को कह रहे हैं, इस शरीर को या भीतर की आत्मा को? अन्न से बना शरीर तो अन्न से बने शरीर से अलग नहीं, और आत्मा तो सबमें एक है।"
लोक परंपरा में कहा जाता है कि शंकराचार्य इस उत्तर से प्रभावित हुए। उन्होंने उसे प्रणाम किया और इसी भाव से मनीषा पंचकम की रचना की, जिसमें कहा गया है कि जिसे यह अद्वैत का ज्ञान है, वही मेरा गुरु है।