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आदि शंकराचार्य और काशी का वह प्रसंग (Adi Shankaracharya and the Man in Kashi)

काशी में आदि शंकराचार्य के साथ घटित प्रसिद्ध प्रसंग, जो बताता है कि हर जीव में एक ही आत्मा है।

📿 संत-भक्त कथाएँ ⏱ 3 मिनट

परंपरा के अनुसार आदि शंकराचार्य अद्वैत वेदांत के महान आचार्य थे। एक बार वे काशी में गंगा स्नान के लिए जा रहे थे।

रास्ते में उन्हें एक व्यक्ति मिला, जो अपने कुत्तों के साथ चल रहा था। शंकराचार्य के शिष्यों ने उसे मार्ग से हटने को कहा।

उस व्यक्ति ने शांत भाव से पूछा, "आप किसे हटने को कह रहे हैं, इस शरीर को या भीतर की आत्मा को? अन्न से बना शरीर तो अन्न से बने शरीर से अलग नहीं, और आत्मा तो सबमें एक है।"

लोक परंपरा में कहा जाता है कि शंकराचार्य इस उत्तर से प्रभावित हुए। उन्होंने उसे प्रणाम किया और इसी भाव से मनीषा पंचकम की रचना की, जिसमें कहा गया है कि जिसे यह अद्वैत का ज्ञान है, वही मेरा गुरु है।

🪔 सीख
सभी प्राणियों में एक ही चेतना है। जन्म, पहनावे या स्थिति के आधार पर किसी को छोटा या बड़ा न समझें।

यह प्रसंग परंपरा में प्रचलित है। विवरण स्रोतों के अनुसार भिन्न हो सकते हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

मनीषा पंचकम क्या है?
आदि शंकराचार्य के नाम से प्रचलित पाँच श्लोकों का स्तोत्र, जिसमें अद्वैत भाव है।
अद्वैत का अर्थ क्या है?
ईश्वर और जीव में भेद नहीं, सब में एक ही चेतना है।
क्या यह प्रसंग ऐतिहासिक है?
यह परंपरा में प्रचलित कथा है। इसके विवरण अलग-अलग स्रोतों में भिन्न मिलते हैं।

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