संत कबीर काशी के जुलाहे थे और अपने सीधे-सरल दोहों के लिए प्रसिद्ध हैं। वे कपड़ा बुनते हुए भी भजन गाते और लोगों को सच्चाई की सीख देते।
कहा जाता है कि उनके पास रोज़ कुछ लोग आते थे जो उनकी साधना और बातों की आलोचना करते। शिष्य उनसे नाराज़ हो जाते, पर कबीर शांत रहते।
एक दिन शिष्यों ने पूछा कि आप उनसे नाराज़ क्यों नहीं होते। कबीर ने मुस्कराकर कहा: "निंदक नियरे राखिए, आँगन कुटी छवाय। बिन पानी, साबुन बिना, निर्मल करे सुभाय।"
उन्होंने समझाया कि जो हमारी कमियाँ बताता है, वह बिना साबुन-पानी के हमारा स्वभाव निर्मल कर देता है। इसलिए आलोचना को शत्रुता नहीं, सुधार का अवसर मानना चाहिए।