जनश्रुतियों के अनुसार बालक नानक का मन बचपन से ही सेवा और भजन में लगता था। उनके पिता मेहता कालू चाहते थे कि बेटा व्यापार सीखे, इसलिए उन्होंने एक दिन उन्हें बीस रुपये दिए और कहा कि जाकर कोई लाभ का सौदा करो।
नानक अपने साथी बाला के साथ निकले। रास्ते में उन्होंने कुछ साधुओं को देखा जो कई दिन से भूखे थे। नानक ने सोचा कि इन भूखों को भोजन कराने से बड़ा सच्चा सौदा और क्या होगा।
उन्होंने बीस रुपये से अन्न और भोजन की व्यवस्था की और साधुओं को पेट भर खिलाया। उसके बाद वे खाली हाथ घर लौटे।
पिता ने जब पूछा कि सौदे का क्या हुआ तो नानक ने शांत भाव से कहा कि मैंने सच्चा सौदा किया है। पिता क्रोधित हुए, पर बाद में नानक की सेवा-भावना का सम्मान उनके जीवन में बार-बार दिखा।
यही भावना आगे चलकर लंगर की परंपरा से जुड़ती है, जहाँ सब लोग एक साथ बैठकर बिना भेदभाव के भोजन करते हैं।