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गुरु नानक देव जी और सच्चा सौदा (Guru Nanak Dev Ji and the True Bargain)

बालक नानक द्वारा व्यापार के पैसों से भूखे साधुओं को भोजन कराने की प्रसिद्ध जनश्रुति, जिसे सच्चे सौदे के रूप में याद किया जाता है।

📿 संत-भक्त कथाएँ ⏱ 3 मिनट

जनश्रुतियों के अनुसार बालक नानक का मन बचपन से ही सेवा और भजन में लगता था। उनके पिता मेहता कालू चाहते थे कि बेटा व्यापार सीखे, इसलिए उन्होंने एक दिन उन्हें बीस रुपये दिए और कहा कि जाकर कोई लाभ का सौदा करो।

नानक अपने साथी बाला के साथ निकले। रास्ते में उन्होंने कुछ साधुओं को देखा जो कई दिन से भूखे थे। नानक ने सोचा कि इन भूखों को भोजन कराने से बड़ा सच्चा सौदा और क्या होगा।

उन्होंने बीस रुपये से अन्न और भोजन की व्यवस्था की और साधुओं को पेट भर खिलाया। उसके बाद वे खाली हाथ घर लौटे।

पिता ने जब पूछा कि सौदे का क्या हुआ तो नानक ने शांत भाव से कहा कि मैंने सच्चा सौदा किया है। पिता क्रोधित हुए, पर बाद में नानक की सेवा-भावना का सम्मान उनके जीवन में बार-बार दिखा।

यही भावना आगे चलकर लंगर की परंपरा से जुड़ती है, जहाँ सब लोग एक साथ बैठकर बिना भेदभाव के भोजन करते हैं।

🪔 सीख
सच्चा लाभ सेवा और निःस्वार्थ दान में है। जरूरतमंद का पेट भरना सबसे बड़ा पुण्य है।

यह प्रसंग जनश्रुति और साखियों में अलग-अलग रूप में मिलता है। विवरण में भिन्नता हो सकती है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

सच्चा सौदा क्या है?
जनश्रुति में बीस रुपये से भूखों को भोजन कराने की घटना को सच्चा सौदा कहा जाता है।
यह प्रसंग किस गुरुद्वारे से जुड़ा है?
चूहड़काणा (वर्तमान पाकिस्तान) में गुरुद्वारा सच्चा सौदा इसी प्रसंग की स्मृति से जुड़ा बताया जाता है।
लंगर की परंपरा क्या है?
सब लोग बिना भेदभाव के एक पंगत में बैठकर भोजन करते हैं।

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