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बातूनी कछुआ और दो हंस (The Talkative Tortoise and the Two Swans)

एक बातूनी कछुए की कहानी, जो बताती है कि सही समय पर चुप रहना भी बुद्धिमानी है। पंचतंत्र की प्रसिद्ध कथा का पुनर्कथन।

एक तालाब में एक कछुआ रहता था। वह बहुत बातूनी था और हर समय बोलता रहता था। दो हंस उसके अच्छे मित्र थे।

एक साल बारिश नहीं हुई और तालाब सूखने लगा। हंस दूसरी जगह जाने की सोचने लगे। कछुआ बोला, "मुझे भी साथ ले चलो, यहाँ मैं मर जाऊँगा।"

हंसों ने कहा, "हम तुम्हें ले जा सकते हैं, पर एक शर्त है। हम एक लकड़ी का डंडा पकड़ेंगे और तुम बीच से अपने मुँह में उसे पकड़ लोगे। रास्ते में कुछ भी हो जाए, तुम बिल्कुल मत बोलना।" कछुए ने वादा किया।

हंस उड़ चले। नीचे गाँव के लोग यह अनोखा दृश्य देखकर हँसने लगे और कहने लगे, "देखो, हंस कछुए को ले जा रहे हैं!"

कछुए से रहा नहीं गया। वह बोलने के लिए जैसे ही मुँह खोलता है, डंडा छूट जाता है और वह नीचे गिर पड़ता है। इस तरह उसकी बातूनी आदत उसकी हानि का कारण बनी।

🪔 सीख
जब बोलना ज़रूरी न हो तब चुप रहना अच्छा है। अपने मित्रों की सलाह माननी चाहिए।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

यह कहानी कहाँ से ली गई है?
यह पंचतंत्र की प्रसिद्ध कथाओं में से एक है।
इस कहानी से क्या सीख मिलती है?
समय पर संयम और मित्रों की सलाह मानना।
यह किस उम्र के बच्चों के लिए है?
पाँच वर्ष और उससे बड़े बच्चों के लिए।

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