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श्रवण कुमार की मातृ-पितृ भक्ति (Shravan Kumar and His Parents)

अंधे माता-पिता को काँवर में बैठाकर तीर्थ कराने वाले श्रवण कुमार की रामायण-कथा, जो माता-पिता की सेवा का आदर्श है।

श्रवण कुमार के माता-पिता नेत्रहीन थे। श्रवण दिन-रात उनकी सेवा करते थे। एक दिन माता-पिता ने तीर्थ यात्रा की इच्छा जताई। श्रवण ने बाँस की एक काँवर बनाई, उसके दोनों पलड़ों में माता-पिता को बैठाया और कंधे पर उठाकर यात्रा पर निकल पड़े।

यात्रा करते हुए वे अयोध्या के पास एक वन में पहुँचे। संध्या हो चली थी। माता-पिता को प्यास लगी तो श्रवण उन्हें पेड़ के नीचे बिठाकर सरयू के तट पर जल लेने गए।

उसी वन में राजा दशरथ आखेट के लिए आए हुए थे। अँधेरे में उन्होंने घड़े में पानी भरने की आवाज़ सुनी और समझा कि कोई हाथी पानी पी रहा है। उन्होंने शब्दभेदी बाण चला दिया, जो श्रवण को जा लगा।

दशरथ दौड़कर पहुँचे तो घायल श्रवण ने कहा कि मेरी चिंता न करें, मेरे प्यासे माता-पिता को यह जल पहुँचा दें। यह कहकर उन्होंने प्राण त्याग दिए।

दशरथ जल लेकर माता-पिता के पास गए और सारी बात बताई। वे दोनों पुत्र-शोक में विलाप करने लगे और कथा के अनुसार उन्होंने दशरथ को शाप दिया कि तुम भी पुत्र के वियोग में प्राण त्यागोगे। आगे चलकर रामायण में यही शाप राम के वनवास के समय सामने आता है।

🪔 सीख
माता-पिता की सेवा सबसे बड़ा धर्म है। जल्दबाज़ी में लिया गया कोई भी कदम भारी पछतावा दे सकता है।

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

श्रवण कुमार की कथा किस ग्रंथ में है?
वाल्मीकि रामायण के अयोध्याकांड में दशरथ द्वारा सुनाए गए प्रसंग के रूप में।
काँवर का इस कथा से क्या संबंध है?
लोक परंपरा में श्रवण की काँवर को काँवड़ यात्रा की भावना से जोड़ा जाता है।
बच्चों को इससे क्या सिखाएँ?
बड़ों का आदर, सेवा और सावधानी।

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