महाभारत के पात्र कर्ण अपनी दानशीलता के लिए प्रसिद्ध थे। परंपरा है कि सूर्य की पूजा के बाद वे जो भी माँगता, उसे दान दे देते थे और कभी किसी को खाली हाथ नहीं लौटाते थे।
कर्ण जन्म से कवच और कुंडल धारण किए हुए थे, जो उनकी रक्षा करते थे। कथा के अनुसार महाभारत युद्ध से पहले देवराज इंद्र को चिंता हुई कि जब तक कर्ण के पास यह कवच है, अर्जुन के लिए उन्हें हराना कठिन होगा।
सूर्यदेव ने स्वप्न में कर्ण को सावधान किया कि इंद्र ब्राह्मण का वेश धरकर तुमसे कवच-कुंडल माँगने आएँगे, तुम उन्हें मत देना। कर्ण ने उत्तर दिया कि मेरे द्वार से कोई याचक खाली नहीं जाता।
अगले दिन इंद्र ब्राह्मण बनकर आए और दान माँगा। कर्ण समझ गए, फिर भी उन्होंने बिना हिचक अपने कवच और कुंडल शरीर से अलग करके दे दिए।
इंद्र उनकी उदारता से प्रभावित हुए और बदले में उन्हें एक दिव्य शक्ति दी, जिसे वे एक बार ही चला सकते थे। कर्ण का नाम तभी से दानवीर के रूप में लिया जाता है।