दंडकारण्य में मतंग ऋषि के आश्रम के पास शबरी नाम की वृद्ध भक्त रहती थी। गुरु के वचन थे कि एक दिन स्वयं श्रीराम उसके द्वार पर आएँगे। तब से शबरी रोज़ मार्ग बुहारती और फूल बिछाकर प्रतीक्षा करती।
वर्षों बीत गए। एक दिन सच में श्रीराम और लक्ष्मण उसके आश्रम पहुँचे। शबरी के नेत्र आनंद के आँसुओं से भर आए। उसने उन्हें आसन दिया और चरण धोए।
शबरी ने वन से चुने हुए मीठे बेर लाकर श्रीराम को दिए। कथा में कहा जाता है कि वह हर बेर को पहले चखकर देखती कि मीठा है या नहीं, ताकि प्रभु को खट्टा बेर न मिले।
श्रीराम ने बिना किसी संकोच के प्रेम से वे बेर खाए। लक्ष्मण को यह देखकर आश्चर्य हुआ, पर राम ने कहा कि भाव से दी गई वस्तु ही सबसे प्रिय है।
श्रीराम ने शबरी को नवधा भक्ति का उपदेश दिया और आगे सीता जी की खोज का मार्ग भी उससे पूछा। शबरी ने मार्ग बताया और अपना जीवन पूर्ण मानकर आगे की यात्रा के लिए प्रस्थान किया।