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जटायु का बलिदान (The Sacrifice of Jatayu)

वृद्ध जटायु द्वारा सीता माता की रक्षा के लिए रावण से लड़ने की रामायण-कथा, जो कर्तव्य और साहस सिखाती है।

पंचवटी में वनवास के समय जब रावण छल से सीता माता का हरण करके आकाश मार्ग से ले जा रहा था, तब सीता जी की पुकार वन में गूँज उठी।

गिद्धराज जटायु, जो राजा दशरथ के मित्र थे, वृद्ध हो चुके थे। फिर भी उन्होंने पुकार सुनी तो चुप नहीं बैठे और रावण को ललकारकर रोका।

जटायु ने अपनी चोंच और पंजों से रावण पर प्रहार किया और उसके रथ को क्षति पहुँचाई, पर रावण अधिक बलवान था। उसने तलवार से जटायु के पंख काट दिए और वे घायल होकर धरती पर गिर पड़े।

जब राम और लक्ष्मण सीता की खोज में निकले तो उन्हें घायल जटायु मिले। जटायु ने रावण के दक्षिण दिशा की ओर जाने की बात बताई और प्राण त्याग दिए।

श्रीराम ने उन्हें पिता के समान सम्मान देकर अपने हाथों से उनका अंतिम संस्कार किया।

🪔 सीख
अन्याय के सामने चुप न रहें। सामर्थ्य कम हो तब भी सही के लिए खड़े होना ही सच्चा धर्म है।

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

जटायु कौन थे?
रामायण के अनुसार गिद्धराज, जो दशरथ के मित्र थे।
श्रीराम ने जटायु के लिए क्या किया?
उनका अंतिम संस्कार अपने हाथों से किया।
बच्चों को क्या सिखाएँ?
साहस और दूसरों की रक्षा का भाव।

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