एक दिन शिव-पार्वती के पुत्र गणेश और कार्तिकेय में बहस हुई कि दोनों में कौन श्रेष्ठ है। माता-पिता ने कहा, "जो पहले पूरी पृथ्वी की परिक्रमा करके आएगा, उसकी जीत होगी।"
कार्तिकेय अपने मोर पर बैठकर तुरंत निकल पड़े। गणेश जी का वाहन छोटा सा मूषक था, जिसकी गति धीमी थी। फिर भी वे शांत मन से सोचने लगे।
गणेश जी ने माता पार्वती और पिता शिव को एक स्थान पर बिठाया और उनकी श्रद्धा से परिक्रमा की। फिर हाथ जोड़कर बोले, "मेरे लिए तो आप ही संपूर्ण संसार हैं।"
शिव-पार्वती उनकी बुद्धि और भक्ति से बहुत प्रसन्न हुए। जब कार्तिकेय पृथ्वी की परिक्रमा करके लौटे तो देखा कि गणेश पहले से वहाँ विराजमान हैं। माता-पिता ने गणेश को विजेता घोषित किया।
तभी से हर शुभ कार्य के आरंभ में गणेश जी की पूजा की परंपरा मानी जाती है। यह कथा बुद्धि और माता-पिता के सम्मान की महिमा का संदेश देती है।