इक्ष्वाकु वंश के राजा सगर के साठ हज़ार पुत्र कपिल मुनि के क्रोध से भस्म हो गए थे। उनकी मुक्ति के लिए गंगा जल की आवश्यकता थी, पर गंगा स्वर्ग में थीं।
सगर के वंशज कई पीढ़ियों तक प्रयास करते रहे, पर सफल नहीं हुए। अंत में राजा भगीरथ ने राज्य छोड़कर हिमालय में कठोर तपस्या की।
कथा के अनुसार उनकी तपस्या से ब्रह्मा प्रसन्न हुए और गंगा को पृथ्वी पर भेजने का वचन दिया। पर समस्या यह थी कि गंगा का वेग इतना प्रबल था कि पृथ्वी उसे सह नहीं सकती थी।
तब भगीरथ ने भगवान शिव की आराधना की। शिव प्रसन्न हुए और उन्होंने गंगा को अपनी जटाओं में धारण कर लिया। फिर धीरे-धीरे एक धारा के रूप में गंगा पृथ्वी पर आईं।
भगीरथ आगे-आगे चलते गए और गंगा पीछे-पीछे बहती गईं। इसी कारण गंगा को भागीरथी भी कहा जाता है। कथा में कहा गया है कि गंगा के जल से सगर पुत्रों का उद्धार हुआ।