मनोजवं मारुततुल्यवेगं जितेन्द्रियं बुद्धिमतां वरिष्ठम्।
वातात्मजं वानरयूथमुख्यं श्रीरामदूतं शिरसा नमामि॥
अतुलितबलधामं हेमशैलाभदेहं
दनुजवनकृशानुं ज्ञानिनामग्रगण्यम्।
सकलगुणनिधानं वानराणामधीशं
रघुपतिप्रियभक्तं वातजातं नमामि॥
अर्थ / लाभ
मन के समान तेज़ गति वाले, इन्द्रियों को जीतने वाले, बुद्धिमानों में श्रेष्ठ, पवनपुत्र, वानरों के प्रमुख श्रीरामदूत हनुमान को मैं सिर झुकाकर प्रणाम करता हूँ। दूसरा श्लोक अतुलित बल, स्वर्ण पर्वत के समान देह और रामभक्ति की स्तुति है।
मन के समान तेज़ गति वाले, इन्द्रियों को जीतने वाले, बुद्धिमानों में श्रेष्ठ, पवनपुत्र, वानरों के प्रमुख श्रीरामदूत हनुमान को मैं सिर झुकाकर प्रणाम करता हूँ। दूसरा श्लोक अतुलित बल, स्वर्ण पर्वत के समान देह और रामभक्ति की स्तुति है।