लंका तक पहुँचने के लिए श्रीराम की वानर सेना समुद्र पर पुल बना रही थी। नल और नील की देखरेख में बड़े-बड़े पत्थरों पर राम का नाम लिखकर पानी में रखे जा रहे थे।
उसी समय एक नन्ही सी गिलहरी भी वहाँ आई। उसे लगा कि वह भी कुछ सहायता करे। वह बार-बार समुद्र में नहाती, फिर रेत में लोटकर अपने शरीर पर रेत लगाती और जाकर पत्थरों के बीच की दरारों में झाड़ देती।
कुछ वानरों ने उसे देखकर हँसी उड़ाई, "तू इतनी छोटी है, तेरे रेत के कणों से क्या होगा?" गिलहरी चुप रही, पर अपना काम करती रही।
जब श्रीराम को यह पता चला तो उन्होंने गिलहरी को अपनी हथेली में उठाया और प्रेम से उसकी पीठ पर उँगलियाँ फेरीं। लोक परंपरा में कहा जाता है कि गिलहरी की पीठ पर बनी धारियाँ उसी स्नेह का चिह्न हैं।
श्रीराम ने कहा कि हर किसी का प्रयास उसकी शक्ति के अनुसार मूल्यवान है, और सेवा में छोटे-बड़े का भेद नहीं होता।